Monday, April 12, 2010

सांसदों की दुनिया में ब्लॉगिंग के हल्ले और गोविंदाचार्य की सनसनीखेज चिट्ठी!


(sansadji.com)

ऑन लाइन मीडिया सांसद लालकृष्ण आडवाणी, सांसद अमर सिंह, सांसद शशि थरूर आदि के लिए भले अपने मन की बातें प्रसारित करने का माध्यम बन चुका हो, कई हस्तियां ऐसी भी हैं जो पत्राचार के जरिये संसद के बाहर से भीतर तक हवा बांधे हुए हैं। उन्हीं में एक गोविंदाचार्य की ताजा चिट्ठी ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को जुबान पर लगाम की नसीहत दे डाली है।

भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर पार्टी छोड़कर गये नेता प्रायश्चित कर रहे हैं तो हम उचित फोरम पर विचार करेंगे। भाजपा अध्यक्ष से पूछा गया था कि उमा भारती, कल्याण सिंह और गोविंदाचार्य जैसे पार्टी छोड़ चुके नेताओं की वापसी कब तक संभव है। इस पर कुपित संघ परिवार के प्रमुख सदस्य और पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य ने गडकरी को लिखे खुले पत्र में उन्हें अनर्गल बोलने वाले सतही नेता बनने से बचने की सलाह दी है। उन्होंने लिखा है कि आपको वाणी में संयम की बहुत जरूरत है जिससे आपकी छवि अनर्गल बोलने वाले सतही और अक्षम नेता की नहीं बने। आप अपनी पार्टी की उठापटक में मुझे नहीं घसीटें और अनावश्यक टिप्पणी के माध्यम से मुझे और नुकसान नहीं पहुंचाएं। गोविंदाचार्य ने चार अप्रैल को अपने संगठन राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया था और अपनी भूमिका संरक्षक की बना ली थी। इसी के बाद गोविंदाचार्य की भाजपा में वापसी की अटकलें लगनी लगी थीं। उधर, उमा भारती ने भी अपनी ही बनाई पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। बहरहाल, अपने खुले पत्र में गोविंदाचार्य ने गडकरी की ओर से पार्टी कार्यसमिति के गठन पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए उनकी क्षमता पर सवालिया निशान लगाते हुए लिखा है कि कार्यसमिति की सूची से आपके रूझान और क्षमता का परिचय मिला। और उस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं। अध्यक्ष बनते समय भी आपने उमा भारती और कल्याण सिंह के साथ मेरा नाम बिना जरूरत लिया था।
ये तो रही गोविंदाचार्य की बात। अब आइए भाजपा संसदीय दल के नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा उनके ब्लॉग पर लिखी बातें भी जान लेते हैं। आडवाणी ने लिखा है कि हिंदू संस्कार भारत में लोकतंत्र की सफलता और धर्मनिरपेक्षता के लिए उत्तरदायी हैं। मानव के इतिहास में धर्म के क्षेत्र में विभिन्न मुद्दों पर सबसे अधिक असहिष्णुता देखी गई है। पश्चिमी देशों के विपरीत भारत में धार्मिक क्षेत्र में भी एक खुले दिमाग वाला और उदारवादी रवैया रहा है। हर परिवार ने हिंदू धर्म का अपना अलग संस्करण विकसित किया है। आप अपने विश्वास का सम्मान कर सकते हैं, किसी अन्य का नहीं। आप प्रार्थना करें या नहीं। आप शाकाहारी हो सकते हैं या मांस खा सकते हैं। इन सभी विकल्पों से यह तय नहीं होता कि आप हिंदू हैं या नहीं। हिंदू धर्म में कोई विधर्म या धर्म त्याग नहीं होता क्योंकि वहां आस्था की मूल मान्यताओं, सिद्धांतों या आज्ञाओं का कोई निर्धारित स्वरूप नहीं है। 1980 के दशक में जब वह भाजपा अध्यक्ष थे, तो कनाडा के एक चैनल ने उनसे ‘विश्व में लोकतंत्रों का उदय और पतन’ नामक श्रृंखला पर एक साक्षात्कार लिया था। वे जानना चाहते थे कि भारत में लोकतंत्र इतना सफल क्यों हुआ। लोकतंत्र की सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व देश के लोगों का किसी भी मुद्दे पर विभिन्न दृष्टिकोणों का होना स्वीकार करना और विभिन्न रुखों के प्रति सहिष्णुता रखना है। और भारत में इसकी कभी कमी नहीं रही। अन्य ब्लॉगर सांसद अमर सिंह इन दिनों पूर्वांचल का लगातार दौरा कर रहे हैं। ब्लॉग पर लिखने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, फिर भी दो-तीन रोज पहले मुंबई से लौटकर अमिताभ के घर न रुकने की जो वेदना सनसनीखेज खबर के रूप में प्रसारित की, वह चटपट चटपटे मीडिया की सुर्खियां बन गई। कांग्रेस सांसद शशि थरूर तो वैसे भारतीय मीडिया के तौर-तरीकों को लेकर बेहद दुखी रहते हैं लेकिन सदी के नायक अमिताभ बच्चन की तरह गहरी समझ के साथ ट्विटर पर उनकी लेखनी लगातार चलती रहती है, जिसे पढ़ते भी लोग खूब हैं। पढ़ने वाले लोग भी क्या खूब हैं।

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